छत्रपति शिवाजी महाराज
 

माँ भारती के अमर सपूत,हिन्दवी स्वराज के संस्थापक, राष्ट्रनायक,अतुल्य पराकर्मी, कुशल शासक एवं महान योद्धा छत्रपति शिवाजी महाराज जी को उनके पुण्यतिथि पर कोटिश: नमन।

मातृभूमि की रक्षा को समर्पित आपका निर्भिक एवं स्वातंत्र्य प्रिय व्यक्तितव हम सभी के लिए महान प्रेरणा हैं ।

– योगी आदित्यनाथ                                                       (मुख्यमंत्री ,उत्तरप्रदेश )

छत्रपति शिवाजी महाराज भारत के इतिहास में एक ऐसे महान योद्धा का नाम हैं जिन्होनें अपने युद्घ कौशल से मराठा साम्राज्य को एक ऐसी ऊँचाई पर पहुँचाया जिसकी कल्पना आज तक कोई भी मराठा राजा ने नही किया।

इनकी युद्घ कला ने मराठा साम्राज्य को 4 किले से 300 किले तक पहुँचा दिया। बीस हजार सेना से शुरुआत कर एक लाख तक पहुँचा दिया। समुद्री युद्ध में माहिर होने के कारण इन्हें “Father of Navy” भी कहा जाता है।

भारत में सबसे पहले गोरिल्ला युद्घ की शुरुआत छत्रपति शिवाजी महाराज जी ने ही किया था। जिसे छापामार युद्घ के नाम से जाना जाता है।

तो आइये जानते हैं उनकी पुण्यतिथि पर उनकी वीर गाथाएँ की रचना के बारें में हिन्दी सफ़र के साथ

छत्रपति शिवाजी महाराज

 



 

छत्रपति शिवाजी महाराज जी का जन्म 1630ई में महाराष्ट्र के जुन्नार के पास शिवनेरी के शिवनेरी दुर्ग में हुआ जो पुणे डिस्ट्रिक में आता है। इनके बचपन का नाम शिवाय था जो आगे चलकर छत्रपति शिवाजी महाराज के नाम से विश्व विख्यात हुए।

इनके पिताजी शाहजी भोंसले आदिल शाह की सेना में एक उच्च अधिकारी थे। माताजी जीजा बाई एक गृहणी थी। पिताजी के हमेशा अनुपस्थित के कारण इनकी पालन पोषण घर पर ही हुई माता जी की संरक्षण में।

इन्होनें अपने गुरु दादूजी कोंडे से युद्घ कौशल एवं निति शास्त्र की शिक्षा ली थी। शिवाय बचपन से ही कौशल प्रतिभा के धनी थे।

इनकी माँ बचपन में इन्हें हिन्दू धार्मिक कथाएँ सुनाया करती थी जिसका असर इनकी बुद्धि पर बहुत हुआ।

नागपुर के नजदीक एक छोटा गाँव मावल जो जंगल में था जहाँ इन्होनें तीन साल रहकर वहाँ के लोगो से बहुत कुछ सिखा। और यहीं से इन्हें पता चला की मुगल सेना मराठाओं को गुलाम बना कर रखते हैं।

तब से ये बात इनके मन में घर कर गई और ये हर समय यहीं सोचते थे की मराठाओं को मुगलों से कैसे आजाद करें। हम अपने ही घर में कैद है यही बात उन्हें खाए जा रही थी।

इनके गुरु दादूजी कोंडे यही सोचते थे की शिवाय भी आगे चलकर अपने पिताजी की तरह आदिल शाह की सेना में उच्च अधिकारी बने लेकिन ऐसा नही हुआ। इनके मनमें तो कुछ और ही चल रहा था।

इन्होनें इस छोटे से गाँव के कुछ लोगों के साथ मिलकर ये ऐलान किया की हमें नेजाम शाह और आदिल शाह के चंगूल से आजाद होना हैं यही से उन्होने युद्घ की शुरुआत की।

उन्होनें अली आदिलशाह के अधिकारी को रिश्वत देकर तोरण किला,चाकन किला, कोंडन किला को अपने अधिकार में कर लिया । उसके बाद उन्होनें आबाजी सुंवेर के साथ मिलकर ठाणे, कल्याण, और भिल्वंडी की किलों पर भी कब्जा कर लिया।

इस हार से आदिल शाह बौखला गया। शिवाजी को रोकने के लिए उसने उनके पिताजी को गिरफ्तार कर लिया जिसकी वजह से करीब सात वर्ष तक शिवाजी ने आदिल शाह पर कोई आक्रमण नही किए लेकिन अपने सेना को बढ़ाने के काम लगे रहे।

सन् 1659 की बात हैं शिवाजी की दहशत से तंग आकर बीजापुर की बड़ी साहिबा ने अफ़जल खाँ नामक सेनापति को 10,000 सैनिकों के साथ शिवाजी पर आक्रमण के लिए भेजा।

अफ़जल खाँ बहुत ही क्रुर था। उसने शिवाजी को फंसाने के लिए कई मन्दिरों को तोड़ दिया कई बेगुनाहों को जान से मार दिया लेकिन शिवाजी अपने चतुराई से छापामार युद्घ जारी रखा।

जब शिवाजी पकड़ में नही आये तो अफ़जल खाँ ने जाल बिछाकर शिवाजी को उसके पास आने के लिए नेवता भेजा। शिवाजी भी जानते थे की उनपर हमला हो सकता हैं इसलिये वो भी होशियारी से मिलने गए।

शिवाजी ने जो सोचा था वही हुआ अफ़जल खाँ ने उन्हें धोखे से मारना चाहा लेकिन शिवाजी ने भी कोई कसर नही छोड़ा उन्होने अपने बाघा नाका चाकू से अफ़जल खाँ को चिर कर रख दिया और अफ़जल खाँ की सेना को बुरी तरह से पराजित कर दिया।

इस तरह से आदिल शाह ने कितने सिपाहियों को शिवाजी पर आक्रमण करने के लिए भेजा लेकिन शिवाजी ने सब को पराजित कर मराठा साम्राज्य की नींव को बनाया रखा।

अंतत: बीजापुर के बड़ी साहिबा ने मुगल सम्राट औरंगजेब से मिलकर शिवाजी को मारने के लिए विनती की। औरंगजेब ने अपने सबसे कद्दावार सेनापति मिर्ज़ा राजा जय सिंह को 1.50लाख सिपाहियों के साथ शिवाजी पर आक्रमण करने के लिए भेजा ।

इस युद्घ में शिवाजी को हार हुई और उन्हें बहुत छति का सामना करना पड़ा। फिर भी वह डगमगाये नही। उन्हें कैद कर लिया गया। लेकिन शिवाजी अपने चतुराई से बिमारी का बहाना बना कर वहाँ से किसी तरह अपने बेटे सम्भाजी के साथ बाहर निकल गए।

वहाँ से निकलने के बाद वे गोलकुंडा होते हुए रायपुर पहुँचे।1670 तक शिवाजी ने कई लड़ाईयाँ लड़कर अपने राज्य का एक बड़ा हिस्सा मुगलों से स्वतंत्र करा लिया था।

1671 -1674 तक अली आदिल शाह ने शिवाजी को पकड़ने का भरसक प्रयास किया लेकिन वो हमेशा असफल ही रहा।

अंतत: 1672 में अली आदिल शाह की मृत्यु हो गई । इस खबर से मराठाओं के बीच खुशी की लहर दौड़ पड़ी। और मराठओं के इतिहास में पहली बार पूरी हिन्दू रीति-रिवाज़ से 6 जून 1664ई को छात्रपति शिवाजी महाराज के नाम से राज्याभिषेक हुआ और मराठा साम्राज्य के राजा बने।

3 अप्रैल 1680ई में शिवाजी का स्वास्थ्य बिगड़ जाने के कारण उन्हें तेज बुखार हुआ उसके कुछ दिन बाद ही उनकी मृत्यु हो गईं।

छत्रपति शिवाजी महाराज एक ऐसी शख्सियत थे जिन्होने किसी भी धर्म के लोगों को अनादर नही किया। वे कभी भी मुसलमानों के खिलाफ नही थे।

वे मुगलों के खिलाफ थे क्यूंकि मुगल सेना मराठाओं को गुलाम बना कर रखते थे। उनके बहू बेटियों को अनादर करते थे।

छत्रपति शिवाजी महाराज कभी भी किसी नाड़ी का अपमान नही किये चाहे वो मुसलमान ही क्यों न हों। उनके सेना में बहुत सारे मुसलमान भी थे।

उनकी पुण्यतिथि को हम भारतवासी को कभी नही भूलना चाहिए। 

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