भारतीय मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानी

 

भारत के आजाद होने में शायद हमने कितने वीर सपूतों को खो दिए. उन वीरों में शामिल वैसे भारतीय मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होनें अपनी जान का परवाह किए बिना अपने लोगों के लिए चाहे वो जिस कौम के थे खुशी-खुशी जान न्योछावर कर दिए.

 

लेकिन आजादी के बाद के इतिहास में आज उन स्वतंत्रता सेनानियों के नामों को भूला दिया गया या उनके नामों को किताबों के पन्ने से हटा दिया गया जिन्होनें देश को आजाद कराने के खातिर अपने जान को कुर्बान कर दिया लेकिन ये आज के किसी भी किताबों में इनका जिक्र नहीं किया जाता आखिर क्यों?

 

क्या ये हमारे देश की खातिर नहीं लड़े? आज हम बात कर रहे हैं उन मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानी के बारें में जिन्हें बहुत कम लोग जानते हैं या भारत सरकार इनलोगों के बलिदान का कोई कद्र नहीं करती या इसे उनलोगों तक नही पहुँचने देते जिन्हें इनके बारें में पता नहीं हैं

 

शायद इसीलिए तो कुछ असामाजिक तत्वों को मौका मिल जाता हैं मुस्लिम लोगों पर ताना मारने की इनलोगों का योगदान देशहित में नही हैं इन्हें भारत छोड़कर चले जाना चाहिये

 

उनलोगों को भी इनसे प्रेरणा लेनी चाहिये जिनके मन में मौलवियों के प्रति कोई कद्र नहीं हैं मुसलमानों के प्रति कोई कद्र नहीं है और जिन्हें गलत नजरिये से ही देखा जाता हैं।

 

आज हम आपको बताएँगे उन मुस्लिम वीर सपूतों के बारें जिन्होनें इस आजाद भारत के सपने को सिंचा अपने जान न्योछावर करके अपने जान की कुर्बानी देकर गुलामी की जंजीरों से भारत देश को आजाद कराया.

 

डा सैफुद्दीन किचलू 

जन्म:- 15 जनवरी 1888,अमृतसर, पंजाब 

मृत्यु:- 9 अक्टूबर 1963,दिल्ली 

 

डॉ सैफुद्दीन किचलू को जालियांवाला बाग नरसंहार में ज्यादा याद किया जाता है यह हिंदू मुस्लिम एकता के प्रतीक थे. यह पेशे से एक वकील थे भारत में अंग्रेजों के बढ़ते जुल्म के खिलाफ इन्होंने आजादी के लिए अंग्रेजों से डटकर मुकाबला किया. 

 

उन्होंने अंग्रेजो के खिलाफ विद्रोह करना शुरू किया. ऐसे ही उन्होंने अंग्रेजों के बनाए हुए रौलेट एक्ट कानून का भी विरोध किया जिसमें उन्हें और उनके प्रिय मित्र डॉ सत्यपाल को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था .

 

उन्होंने महात्मा गांधी के साथ असहयोग आंदोलन को बढ़ाने में भी सहयोग किया था. 9 अक्टूबर 1963 में उनके निधन के बाद भारत सरकार ने उनके 100वीं जन्म तिथि पर एक विशेष डाक टिकट जारी किया था.

 

मौलाना मज़हरूल हक़ 

जन्म : 22 दिसंबर 1886, पटना(बिहार)

मृत्यु: 2 जनवरी 1930,पटना 

 

1886 में बिहार के पटना में जन्में मौलाना मज़हरूल हक एक ऐसे स्वतंत्रता सेनानी हुए हैं जो कलम की नोक पर अंग्रेजों को अपने देश से भगाना चाहते थे और उन्होंने ऐसा ही किया.

 

उन्होंने अपने कलम के बल पर अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए उन्होंने अपनी कानून की पढ़ाई इंग्लैंड से की थी जब इंग्लैंड से लौटे तब भारत में ब्रिटिश हुकूमत क बहुत खौफ था उन्हें जल्द ही समझ में आ गया कि यह अंग्रेज भारत के लिए खतरा है तब से ये अंग्रेजों के खिलाफ नये-नये हथकंडे अपनाते.

 

ये अपने अखबार जो मदर लैंड के नाम से जाना जाता है या मातृभूमि के नाम से भी जाना जाता है के जरिए भारत के लोगों से अंग्रेजो के खिलाफ बगावत करने का संदेश भेजते थे 

 

इन्होंने असहयोग आंदोलन, खिलाफत आंदोलन और सत्याग्रह आंदोलन जिसे चंपारण आंदोलन के नाम से भी जाना जाता है इस में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया.

 

इनके सम्मान के लिए भारत सरकार ने पटना में दो यूनिवर्सिटी बनाई जो मजहर-उल-हक यूनिवर्सिटी के नाम से प्रचलित है. 

 

आसफ़ अली

जन्म: 11 मई 1888, कलका

मृत्यु: 1 अप्रैल 1953,नई दिल्ली 

 

आसफ़ अली एक ऐसे स्वतंत्रता सेनानी हुए जो पेशे से एक वकील थे ये अपनी वकालत के जरिए भारत के स्वतंत्रता सेनानियों को ब्रिटिश हुकूमत के चंगुल से बचाते थे.

आपको यह पता होना चाहिए यही आसफ़ अली थे जिन्होंने बटुकेश्वर दत्त और भगतसिंह जैसे वीर सपूत जिन्होंने केंद्रीय विधानसभा में बम फेंका था के केस लड़े थे .

 

खिलाफत आंदोलन में सहयोग देने के कारण इन्हें नेहरू जी के साथ अहमदनगर किले की जेल में नजर बंद कर दिया गया उसके बाद इनकी मृत्यु हो गई.

 

भारत की आजादी में इनके बलिदान के सम्मान के लिए इनके नाम पर भारत सरकार ने 1898 में एक डाक टिकट जारी किया था.

सैय्यद मोहम्मद सर्फुद्दीन

जन्म: 1901,बिहार 

मृत्यु: 30 दिसंर 2015

 

पेशे से एक यूनानी डॉक्टर सैय्यद मोहम्मद सर्फुद्दीन का जन्म 1901 बिहार में मुस्लिम परिवार में हुआ था. यह एक ऐसे मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने महात्मा गांधी के 1930 में शुरू किए गए नमक सत्याग्रह आंदोलन में बढ़ चढ़कर भाग लिए.

 

नमक सत्याग्रह आंदोलन में सैय्यद मोहम्मद सर्फुद्दीन महात्मा गांधी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर उनके साथ भी खड़े रहे. 

 

इन्हें भी महात्मा गांधी के साथ नमक सत्याग्रह आंदोलन में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया.

 

वर्ष 2007 में भारत को आजाद कराने के साहसिक योगदान के लिए भारत सरकार ने इनको पद्म भूषण से सम्मानित किया था इनका निधन 30 दिसंबर 2015 को हो गया.

 

 

पीर अली खान 

जन्म: 1812

मृत्यु: 7 जुलाई 1857

 

पीर अली खान को मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों में सबसे कट्टर माना जाता है इन्होंने 1857 की क्रांति में अंग्रेजों को दौड़ा दौड़ा कर मारा था. 

 

ऐसा कहा गया है कि पीर अली खान को बेवजह जब अंग्रेजों ने गिरफ्तार किया और उनके साथ बदसलूकी की तब वह इस घटना से इतने विचलित हुए कि उन्होंने अंग्रेजों को अपने घर यानी भारत से हमेशा-हमेशा के लिए भगाने की कसम खाए.

 

उन्होंने कोई लोगों के साथ मिलकर एक संगठन बनाया जो अंग्रेजो के खिलाफ लड़ सके लेकिन अंग्रेजों को पता चल जाने के कारण उनके कई साथी मारे गए.

 

फिर भी ये विचलित नहीं हुए और उन्होंने करीब 200 साथियों के साथ मिलकर पटना के गुलजारबाग में अंग्रेजों के मुख्यालय पर हमला बोल दिया जिनमें उनके कई साथी मारे गए.

 

लेकिन अंग्रेज कमांडर लिनयोन भी मारा गया जिससे अंग्रेज बहुत ज्यादा क्रोधित हो गए और पीर अली खान को गिरफ्तार कर उन्हें कड़ी सजा दी और उसके बाद लिनयोन की हत्या के आरोप में इन्हें फांसी की सजा दे गई.

सैय्यद अलाऊद्दीन हैदर 

जन्म: 1824 तेलंगना 

 

यह एक ऐसे क्रांतिकारी थे जो अंग्रेजों की आंख नहीं सुहाते इन्होनें अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए एक संगठन बनाया जिससे वे एकजुट होकर उनका सामना करें.

 

इनका जन्म 1824 में तेलंगाना में हुआ था यह हैदराबाद के मस्जिद मक्का के प्रचारक एवं इमाम भी थे.

 

इन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर हैदराबाद स्थित ब्रिटिश रेजीमेंट पर हमला किया लेकिन दुर्भाग्यवश इनके करीबी सहयोगी ने इनको धोखा दिया जिससे इन्हें सफलता नहीं मिली और यह पकड़े गए उसके बाद इन्हें गिरफ्तार कर अंडमान की काला पानी जेल में डाल दिया गया

 

यह भारत के इतिहास में पहले स्वतंत्र सेनानी थे जिन्हें काला पानी की सजा हुई थी 30 साल तक काला पानी की सजा काटने के बाद इनका निधन हो गया.

 

 

मौलवी अब्दुल्लाह शाह 

जन्म : 1787

मृत्यु: 5 जून 1858

 

मौलवी अब्दुल्लाह शाह एक ऐसे स्वतंत्रता सेनानी का नाम है जिसको पकड़ने के लिए अंग्रेज अधिकारियों ने  ₹50000 की घोषणा की था. वे एक ऐसे क्रांतिकारी थे जिससे अंग्रेज खौफ खाते थे.

 

अंग्रेजों ने इनके सारी संपत्ति हड़प ली जिसके कारण इनके मन में अंग्रेजों के प्रति नफरत हो गई और इन्होंने अपने मन में ठान लिया कि जब तक अंग्रेजों को अपने घर से नहीं भगाएंगे तब तक चैन से नहीं बैठेंगे.

 

इन्होनें कई क्रांतिकारी संगठन बनाये जो अंग्रेजों के खिलाफ़ बगावत कर सके अग्रेजों के दिलों में इनके खिलाफ़ इतना भय बैठ गया की अंग्रेजों ने इन्हें देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर जेल में बंद कर दिया.

 

लेकिन उसी समय 1857 क्रांति छिड़ने के कारण ये किसी तरह जेल से भाग निकले और अंग्रेजों से बचने के लिए इन्होंने बाबायायान के राजा से पनाह मांगे लेकिन राजा ने अपने किले के दरवाजे नहीं खोले जिससे अंग्रेजों ने इन्हें गोलियों से भून डाला इस कारण उनकी मृत्यु हो गई.

 

 

तुर्रेबाज़ खान 

जन्म: बेगमपुर, हैदराबाद 

 

ये अंडमान निकोबार में काला पानी की सजा काटने वाले दुसरे स्वतंत्रता सेनानी थे जो अंग्रेजों को कतई नहीं सुहाते। इन्हें हैदराबाद स्थित ब्रिटिश रेजीमेंट पर हमला करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था.

 

जेल से भागने के क्रम में अंग्रेजों ने इन्हें गोली मार दिया जिससे इनकी मृत्यु हो गई जब इनकी मृत्यु हुई अंग्रेजों ने इनकी लाश को हैदराबाद लाकर फांसी पर लटकाया था.

 

इनके सम्मान में भारत सरकार द्वारा एक सड़क का नाम तुर्रेबाज़ खान रखा गया है जो हैदराबाद में स्थित हैं.

 

 

महमूद अलहसन 

जन्म : 1851, बरेली

मृत्यु: 30 सितंबर 1920

 

 

1851 में जन्में महमूद अलहसन दारुल उलूम में दाखिला लेने वाले पहले शख्स थे इनका मानना था कि बिना युद्ध किए अंग्रेजों को इस देश से भगाना बेहद मुश्किल है।अंग्रेजों ने इनके विद्रोह से घबराकर 1916 में इन्हें गिरफ्तार कर लिया.

 

करीब 3 साल तक जेल में बहुत प्रताड़ना झेलने के बाद जब ये बाहर आए तब इन्होंने एक फतवा जारी किया इसमें लिखा था कि अंग्रेज उपनिवेशको के साथ कोई भी सहयोग हराम है भारत के मुसलमानों का फर्ज़ बनता है कि वे भारत की आजादी के आंदोलन में हिस्सा लें.

 

केंद्रीय खिलाफत समिति द्वारा मोहम्मद अलहसन को शेख-उल-हिंद की उपाधि दी गई है इनका निधन 1920 में हुआ था.

 

 

मगफूर अहमद एजाजी 

जन्म : 3 मार्च 1900,मुजफ्फरपुर

मृत्यु: 26 सितंर 1966

 

 

मगफूर अहमद एजाजी बिहार के मुजफ्फरपुर के रहने वाले थे इनका जन्म 1900 में हुआ था अंग्रेजों ने अपने स्कूल नॉर्थब्रूक  से इन्हें इसलिए निकाल दिया क्योंकि यह भारत के आजादी के आंदोलन में शामिल होने लगे थे.

 

अंग्रेजों ने बिना वजह इनको जेल में डाल दिया और इन पर बहुत यातनाएं की ताकि यह बगावत ना कर सके अंग्रेजों ने इनपर बहुत जुल्म किए इनकी पत्नी और बेटों को भी मार दिया फिर भी यह भारत के आजादी के लिए लड़ते रहे हैं. सन् 1966 में अपने घर मुजफ्फरपुर में ही इनका निधन हो गया.

 

 

कैप्टन अब्बास अली 

जन्म: 3 जनवरी 1920, बुलंदशहर

मृत्यु: 11 अक्टूबर 2014, अलीगढ़ 

 

कैप्टन अब्बास अली चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह के समर्थक थे इन्होंने उनसे ही प्रेरणा ली थी अंग्रेजों को भारत से भगाने की.

 

इनका जन्म यूपी में 1920 में हुआ था यह बचपन से ही अंग्रेजो के खिलाफ नफरत करते थे यह सुभाष चंद्र बोस के साथ आजाद हिंद फौज में भी शामिल थे इन्होंने अंग्रेजों को बहुत दौड़ा-दौड़ा कर मारा था इस कारण उन्हें बहुत बार जेल भी जाना पड़ा 2014 में उनका निधन हो गया.

 

 

मोहम्मद अब्दुर्ररहमान 

जन्म: 1898, केरल

मृत्यु: 1945

 

1898 में केरल में जन्में मोहम्मद अब्दुर्ररहमान एक ऐसे स्वतंत्र सेनानी थे जिन्होंने अपनी पढ़ाई अंग्रेजों से बदला लेने के लिए छोड़ी.

 

1929 में इन्होंने अपने एक अखबार अल अमीर के जरिए भारत के सभी मुसलमानों को अंग्रेजो के खिलाफ एकजुट होने का प्रयास किया था. 

 

इसके लिए उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा भारत के आजादी के आंदोलन में इनका अमूल्य योगदान रहा है यह सुभाष चंद्र बोस के समर्थक भी थे इनका निधन 1945 में हुआ.

 

 

मौलवी मोहम्मद बाकिर

जन्म: 1780 दिल्ली 

मृत्यु : 16 सितंबर 1857

 

1857 की क्रांति में 77 साल की उम्र में ये एक ऐसे क्रांतिकारी  हुए हैं जिन्होंने अंग्रेजों के परखचे उड़ा दिए उन्होंने अपना अखबार अकबरू जफ़र जो बहादुर शाह जफ़र के नाम पर है उसमें भारतीय क्रांतिकारियों के समर्थन में हमेशा कुछ ना कुछ लिखते रहते थे जिसे अंग्रेजों को खूब मिर्ची लगते थे. 

 

अंग्रेजों को डर था कि मौलवी मोहम्मद बाकिर के अखबार के कारण भारत के लोग एकजुट होकर कहीं हमारे खिलाफ विद्रोह ना कर दे इसलिए उन्होंने 14 सितंबर 1857 को इन्हें तोप के सामने रखकर शहीद कर दिया.

 

 

वाक्कम मजीद 

जन्म: 20 दिसंबर 1909, मद्रास

मृत्यु: 10 जुलाई 2000

 

1909 में जन्में वाक्कम मजीद अपने स्कूली दिनों से ही अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन में भाग लेते थे . 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के कारण अंग्रेजों ने इन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया और इन्हें बहुत कठोर से कठोर सजाय दी जिससे इनका निधन हो गया.

 

इनके सम्मान में भारत सरकार ने 1972 में ताम्रपत्र से इन्हें सम्मानित किया.

 

 

बख्त खाँ 

जन्म: 1797

मृत्यु: 13 मई 1859

 

 

ये एक ऐसे क्रांतिकारी थे जिससे अंग्रेज हमेशा खौफ खाते थे इनका 1857 की क्रांति में महत्वपूर्ण योगदान रहा.

 

ईस्ट इंडिया कंपनी में जब ये सैन्य कमांडर के पद पर थे तब उन्होंने देखा की अंग्रेज अधिकारी भारतीय लोगो को बहुत प्रताड़ित करते थे.

 

ये सब देखने के बाद उनके दिल में अंग्रेजों के खिलाफ़ नफरत भर गई और उन्होनें अंग्रेजों के खिलाफ़ बहुत सारे आंदोलन भी किए.

 

जब बहादुर शाह जफ़र को अंग्रेजो ने गिरफ्तार किया तब उस समय बख्त खाँ ही थे जिन्होंने बागडोर संभाली थी.

 

हथियार, गोला बारूद की कमी के कारण यह आंदोलन धीरे-धीरे कमजोर पड़ गया और अंग्रेजों ने 13 मई 1898 को बख्त खाँ को शहीद कर दिया.

 

 

आजाद भारत के इतिहास में ये ऐसे स्वतंत्रता सेनानी हुए जिन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना अपने लोगों के लिए अपने देश के लिए जान न्योछावर किया.

 

 

आज के सभी मुसलमानों को इन स्वतंत्रता सेनानियों से प्रेरणा लेनी चाहिए ये देश हमारा है और हमें अपनी मातृभूमि की रक्षा के हमेशा तत्पर रहना चाहिए कभी भी हमारे अंदर देश के प्रति गलत भावना नहीं पनपना चाहिए.

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